अदालत की अहम चेतावनी
हाईकोर्ट ने कहा कि बिना ठोस, विश्वसनीय और निष्पक्ष साक्ष्यों के यदि ऐसी वसीयतों को स्वीकार किया गया, तो यह एक खतरनाक परंपरा को जन्म देगा। इससे दबाव, प्रभाव और शोषण के जरिए वसीयत लिखवाकर संपत्ति हड़पने के मामलों में वृद्धि हो सकती है।
संदिग्ध वसीयत पर ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार
संदिग्ध परिस्थितियों में बनाई गई वसीयत (Will) को लेकर चल रहे इस विवाद में हाईकोर्ट ने प्रथम अपर जिला न्यायाधीश, सतना के निर्णय को सही ठहराया। ट्रायल कोर्ट ने वसीयत, नामांतरण आदेश तथा विक्रय विलेख को शून्य एवं अवैध घोषित किया था। हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं की प्रथम अपील खारिज कर दी।
क्या था पूरा मामला
मामला सतना जिले की कृषि भूमि से जुड़ा है। आराजी नंबर 1290 की 10 एकड़भूमि के मूल स्वामी बुद्धसेन का निधन 9 जनवरी 1988 को हुआ था। उनकी पत्नी और बच्चों ने दावा किया कि वे ही बुद्धसेन के वैध उत्तराधिकारी हैं और मृत्यु के बाद से भूमि पर उनका ही कब्जा रहा। इसके विपरीत, प्रतिवादी रमेश प्रताप सिंह ने 18 सितंबर 1985 की कथित वसीयत के आधार पर 30 मई 1988 को अपने नाम नामांतरण करवा लिया। बाद में उसने 29 फरवरी 1992 को भूमि को नीतू वर्मा के पक्ष में विक्रय कर दिया। इस पर मामला सतना की जिला अदालत पहुंचा। वहां पर बुद्धसेन की पत्नी व बच्चों के दावे पर एडीजे कोर्ट ने 10 नवम्बर 2000 को बुद्धसेन की वसीयत को संदेहास्पद पाते हुए उसके आधार पर किए गए नामांतरण को अवैध ठहराते हुए जमीन बुद्धसेन के आश्रितों को देने के आदेश दिए गए। इस फैसले को चुनौती देकर यह अपील दाखिल की गई।
वादियों का आरोप
वादियों का कहना था कि वसीयत पूरी तरह मनगढ़ंत और दबाव में बनाई गई है। बुद्धसेन ने अपनी पत्नी और बच्चों को संपत्ति से वंचित करने का कोई ठोस कारण नहीं बताया। वसीयत का लाभ एक गैर-रिश्तेदार और प्रभावशाली व्यक्ति को दिया गया, जो स्वाभाविक नहीं है।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वसीयत के लेखन और सत्यापन की तिथियों में असंगति है। गवाहों के बयान अस्वाभाविक और अविश्वसनीय हैं। कोई भी समझदार व्यक्ति बिना ठोस कारण के अपनी पत्नी और बच्चों को संपत्ति से वंचित नहीं करेगा। अदालत ने दो टूक कहा कि यदि ऐसी वसीयतों को मान्यता दी गई, तो यह गरीब और कमजोर वर्ग के शोषण का रास्ता खोल देगा, जो कानून के उद्देश्य के विपरीत है।
अपील खारिज
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। परिणामस्वरूप, अपीलकर्ताओं की प्रथम अपील खारिज कर दी गई।
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